आपकी सोच और रहन सहन का समाज में प्रभाव। Your thinking and living influence in society.




आप सोच रहे होंगे कि नई पीढ़ी का रहन सहन का समाज में क्या प्रभाव पड़ेगा. आओ इसको विस्तार से समझे।
     इसकी वजह कई हद तक माता पिता है। मै ये नहीं कह रहा कि सारे पर हो सकता है कि आगे चल कर सारे ही माता पिता इसके जि्मेदार हो। आजकल बच्चें एक दो साल के हुए नहीं की माता पिता उसको उसके भविष्य के बारे में सोचने लगते है और और उन पर दिन प्रतिदिन दबाव डालना शुरू कर देते हैं । पर आप जानते हो जब बच्चो का विकास हो रहा होता है तो उसके दिमाग में ये सारी बातें हावी होने लगती हैं।और वो एक दूसरी दुनिया की तरफ मुड जाता है ( जहां भ्रटाचार, झूठ.... ) हैं।
     आज कल ज्यादातर  लोग बच्चो को बस पैंसे कैसे कमाने है इन बातो पर चर्चा करते है और ये बातें बच्चों के अवचेतन मस्तिष्क में घर कर जाती है, जिसका नतीजा बच्चे या तो अवसाद ग्रस्त हो जाते है या उन में भावनाएं कि कमी पाई जाती हैं । जो आगे चलकर उनको गलत रास्ते पर ले जाती हैं।और जो कि आगे चलकर ना तो परिवार के लिए हितकर होता है और ना समाज के लिए। अब आप सोच रहे होंगे ये कैसे हो सकता हैं।
        ठीक है एक बार पीछे मुड के देखते हैं, जब बच्चे बड़े  हो रहे होते है तो उनको प्यार की जगह उसके भविष्य के बारे में बात की गई, जिस समय उनके खेलन कूदने के दिन थे। तो वो भविष्य को लेकर इतना चिन्तित हो जाता है कि उसको गलत और सही का फर्क ही नजर नी आता। तब वो सहारा लेता है सोशियल मीडिया का और आप को ये पता ही है कि सोशियल मीडिया जो आप देखना चाहते हो वो देख सकते हो।
    अब जिन बच्चों ने पैंसो को अहिमत दी है ( जो कि बचपन से हमने उनके दिमाग में डाली है) वो किसी ना किसी तरह एक आसान रास्ता ढूंढ लेते है। और फिर आगे नौकरी लगने के बाद क्या आपको लगता है कि वो ईमानदारी से नौकरी करेगा, और फिर यहां से शुरू होता है, भ्रटाचार......। और पूरे समाज में एक महामारी कि तरह फैल जाती हैं।
   मै ये नहीं कह रहा कि ईमानदारी खत्म हो गई है ऐंसा बिल्कुल भी नहीं है, लेकिन हम इसके रोक सकते है। पर सवाल ये है कि कैसे?
       अपने बचपन को याद कीजिए आप ने क्या सही किया कि आप आज एक जिममेदार व्यक्ति है। क्या आपका खेलना कूदना बंद कर दिया गया था ? आपको आपके माता पिता ने क्या संस्कार दिए थे ? क्या आप अपने बच्चो को सब कुछ दे रहे हो ? ..... अब बात आती है कि क्या किया जाए ?
 हो सकता है कि मै कई हद तक सही नहीं हूं, पर मेरी राय मैं जरूर बताना चाहता हूं।
        आप ने एक बात जरूर गौर कि होगी,  कि आजकल के बच्चे सोशियल मीडिया का जरूरत से जायदा उपयोग करने लगे है, और बच्चो की शारीरिक व्यायाम खत्म हो चुका है। जिसका नतीजा ये है कि उनकी रोग प्रतरोधक क्षमता बिल्कुल ना के बराबर है। जिस वजह से मोटापा, गंभीर बीमारियां.... । देखने को मिल रही हैं।
     क्या आपने कभी गौर किया है कि किसान के बच्चे धूप, मिट्टी ..... में काम करते है लेकिन उन्हें बहुत कम बीमारी होती है आखिर क्यों? क्यूकी उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। और वहीं एक तरफ दूसरे बच्चे, ( चिड़चिड़ापन, गुस्सा, माता पिता से ठीक से बात ना करना....।)
  शायद आप मेरी बातो को समझ रहे होंगे, कि मै क्या बोलना चाहा रहा हूं।
      अंत में मैं यही कहूंगा कि जो बात दिल और दिमाग से एक साथ निकले वो ही हमारे संस्कार है।
   

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