मीडिया द्वारा बदलता समाज।


आजकल 50% से ज्यादा न्यूज़ चैनल न्यूज़ नहीं बल्कि टीआरपी के लिए काम करते हैं। पहले भी हम न्यूज़ देखा करते थे जब केवल कुछ न्यूज़ चैनल होते थे और उसमें सही खबरें बताई जाती थी। सही खबरें तो अभी भी बताई जाती हैं लेकिन वह किस तरह दिखाई जाती हैं इसलिए मैं यह लिख रहा हूं।

न्यूज़ एंकर का मकसद।
आजकल की न्यूज़ देखकर या लगता है वह केवल हम लोगों को किस तरीके से बिजी रखें। पहले लोग कहा करते थे सुबह उठते ही न्यूज़ देखो लेकिन अभी न्यूज़ चैनल देख कर और उनकी न्यूज़ को देखकर न्यूज़ देखने का मन ही नहीं करता क्योंकि आपने देखा होगा हर जगह नेगेटिव न्यूज़ देखने को मिलती है अब आप सोचो सुबह उठते ही जब आपका मन बिल्कुल फ्रेश हो और आप नेगेटिव चीजें सुनें तो पूरा दिन कैसा जाएगा।
अब इसमें प्रश्न यह उठता है कि जब नेगेटिव चीजें हो रही है तो नेगेटिव ही दिखाई जाएंगी यह बात बिल्कुल सही है लेकिन क्या पहले कभी नेगेटिव घटनाएं नहीं होती थी बिल्कुल होती थी लेकिन प्रश्न जो उठता है कि जो नेगेटिव घटनाएं हैं वह प्रस्तुत करने का तरीका क्या है कुछ एंकर न्यूज़ में अपनी बातों को बहुत ही अच्छे तरीके से रखते हैं वह अपनी बात इस तरीके से रखते हैं कि वह हमारे ऊपर डिपेंड होता है कि हम उसको किस तरीके से समझे और यह सही मायने में सही भी है लेकिन अभी ज्यादातर न्यूज़ चैनल केवल टीआरपी के लिए ही काम करते हैं।
आजकल न्यूज़ चैनल डिबेट करते हैं और उस डिबेट में (अगर आप गौर से सुने तो आपको पहले ही पता लग जाएगा की एंकर किस का बचाव कर रहा है) पहले ही तय हो जाता है क्या बोलना है और क्या बुलवाना है जोकि बिल्कुल सही नहीं है। अब वह बेचारे करे भी तो क्या करें दिन भर जो न्यूज़ दिखानी है तो कुछ ना कुछ तो होना जरूरी है अगर एक चूहा भी मर जाए ना तो यह उसमें 2 घंटे निकाल सकते हैं अब मैं यह कहूं यह उनका टैलेंट है बिल्कुल सही है लेकिन क्या वह इस टैलेंट को वह सही दिशा में यूज़ नहीं कर सकते? लेकिन वह भी क्या करें यह जो पूरी चेन बनी होती है क्या बोलना है क्या बुलवाना है कब तक बोलना है यह सब तय होता है।

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                     न्यूज़ चैनल का अपने नजरिए से तय करना।


आजकल न्यूज़ चैनल वाले पहले से तय करते हैं आज किस को हीरो बनाना है और किसको जीरो उदाहरण के तौर पर जब इंडिया का मैच होता है और इंडिया टीम अच्छी खेल रही होती है तो कहते हैं हमारे शेर है देश का गर्व है न जाने क्या क्या कहते हैं 2 या 3 घंटे उस न्यूज़ को खींचते रहते हैं और ना जाने खिलाड़ियों को किस किस नाम से बुलाते हैं (अच्छे नामों से) लेकिन जब वही टीम कुछ मैच हार जाती है तो उनको शेर से सीधा गीदड़ बना देती है खिलाड़ियों ने तो कहता है हम शेर हैं। या हमारे बारे में कोई न्यूज़ दो या चढ़ा बढ़ाकर बोलो वह तो खेल रहे थे लेकिन न्यूज़ वालों को मसाला चाहिए टीआरपी चाहिए वह आए कहां से ऐसे ही तो आएगी।
      कई बार आप देखते होंगे किसी न्यूज़ का प्रचार वह दोपहर से ही करने लग जाते हैं चाहे न्यूज़ 9:00 बजे दिखानी हो और वह इस तरीके से दिखाते हैं कि हम उस समय का इंतजार करते हैं और जब आधा 1 घंटे तक न्यूज़ देखते हैं तो न्यूज़ में कुछ नहीं होता है (कहीं बिल्ली फंसी है तो कहीं चूहा मारा है) बस यही खबरें होती है।
मुझे लगता है न्यूज़ एंकर को खबरें दिखाना नहीं बल्कि यह सिखाया जाता है कि ऑडियंस को कैसे बिजी रखिए और यह भी एक टैलेंट है लेकिन अगर यह चाहे तो इसका सही इस्तेमाल कर सकते हैं।
  अभी जैसे कोरोना महामारी जैसी बीमारी चल रही है कुछ न्यूज़ चैनल अपने तरीके से न्यूज़ बनाने लगे हैं लोगों के अंदर इतना डर फैला चुके हैं अगर कोई कोरोना पॉजिटिव निकलता है तो वह वैसे ही मर जाएगा। बस 24 घंटे कोरोना की ही खबर, मैं यह पूछना चाहता हूं जब करोना महामारी आई थी क्या उस समय देश में कुछ घटनाएं होती ही नहीं थी? जो केवल कोरोना की ही न्यूज़ दिखाते रहते हैं।
कुछ हद तक हमारा देश जो पिछड़ रहा है वह ऐसी घटनाओं से पिछड़ रहा है क्योंकि जब भी कोई डिबेट होती है तो न्यूज़ एंकर का काम होता है डिबेट में आए हुए नेताओं से इस तरीके से सवाल पूछना या मैं कहूं उनको फसाना अपने मनमाने ढंग से उनसे बुलवाना जो वह बुलवाना चाहते हैं। जिस से होता क्या है दूसरे दिन एक नई न्यूज बन जाती है। तो सरकार या नेता काम करे तो कब करें जब ऐसी न्यूज़ उसे छुटकारा मिले, क्योंकि यह सिलसिला चलता ही रहता है।

न्यूज़ समाज को एक अच्छी दिशा की ओर ले जा सकता है।
अगर देखा जाए न्यूज़ चैनल एक बहुत बड़ा हथियार है जो किसी भी देश के लिए उसको सही दिशा भी दे सकता है और गलत दिशा में भी ले जा सकता है।
      न्यूज़ चैनलों को यह पता होना चाहिए कौन सी घटना कब दिखानी चाहिए और कब नहीं और कितनी दिखानी चाहिए और कितने नहीं जिससे कि हमारे समाज में एक डर और उलझन का मौहल ना बने। और अगर नेगेटिव घटनाएं भी है तो उन्हें किस तरीके से प्रस्तुत करना है यह उन्हें पता होना चाहिए जोकि उनके पास टैलेंट होता है।
     हमारे देश में आजादी है कि कोई कुछ भी बोल सकता है और लिख सकता है यह उसका अधिकार लेकिन अब यही अधिकार देश के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। और हम सब लोग ऐसे ही घटनाओं में उलझे रहते हैं और यह अब हर रोज की दिनचर्या बन गई है।

आखिर इसका जिम्मेदार कौन है?
काफी हद तक हम सब लोग इसके जिम्मेदार हैं हम न्यूज़ देखते हैं और जो नेगेटिव घटनाएं होती हैं उनकी हम ज्यादा चर्चा करते हैं और उसी घटनाओं को हम देखना पसंद करते हैं न्यूज़ चैनल वालों को अच्छे से पता होता है कि लोगों को कौन सी न्यूज़ अच्छी लगती है और कौन सी नहीं जिसका वह पूरा फायदा उठाते हैं।
     अभी भी कुछ न्यूज़ चैनल ऐसे हैं जो सही मायने में देश हित के लिए काम कर रहे हैं और सही न्यूज़ और न्यूज़ प्रस्तुत करने का तरीका बिल्कुल सही है।

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3 टिप्पणियां

  1. Bhut acha aur sahi likha h .duniya badalti h soch badalti bus sahi ka sath dena h.

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  2. Nice bus ese hi logo ke samne sahi baat late rahe .👍👍👍

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  3. कम शब्दों में आपने सही बात कही। या तो पत्रकारिता बदले या फिर दर्शक। पत्रकारिता तो बदलेगी नहीं क्यूंकि उनको अपनी दुकान चलानी है। सो हमें ही खुद को बदलना पड़ेगा। सही विश्लेषण वाली खबरें देखें और सकारात्मक खबरें सोशल मीडिया में शेयर करें ताकि मीडिया हाउसेज को भी समझ में आए की दर्शक क्या देखना चाहते हैं। बदलना खुद को पड़ेगा। तभी देश बदलेगा।

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