समाज में आस्था का बदलता स्वरूप।


कुछ दशकों से समाज में भगवान में आस्था के अनेक मत प्रकट हुए हैं। कोई भगवान को मानता है। कोई विज्ञान को मानता है। आज के युग में हर व्यक्ति की आस्था भगवान के प्रति अलग है। कई बुद्धिजीवी केवल विज्ञान को ही महत्त्व देते हैं। उनके अनुसार जो हमारे ग्रंथ हैं वह केवल एक पौराणिक कथाएं हैं।
    और वही विज्ञान हमारे पौराणिक ग्रंथों पर शोध कर रहे हैं। और शोध के अनुसार जो बातें ग्रंथों में लिखी गई है वह सत्य है। यह भी विज्ञान कहता है उदाहरण के तौर पर राम सेतु पुल।तो इसमें भी विज्ञान के दो मत हैं एक ओर वह भगवान को मानते हैं ।दूसरी ओर वह हमारे ग्रंथों को पौराणिक कथाएं कहते हैं।
    आपने बहुत बार देखा होगा जब भी कोई नई तकनीकी हमारे समाज में आती है तो उसकी पूजा विधि होती है। तो यहां पर सोचने वाली बात है अगर हमारे ग्रंथ केवल पौराणिक कथाएं हैं। तो जब भी कोई नई तकनीकी आती है तो विधि पूर्वक पूजा क्यों की जाती है। कहीं ना कहीं विज्ञान भी इस बात को मानता है।
       असल में विज्ञान को किसी भी बात को समझने के लिए  तथ्य की आवश्यकता होती है। जोकि आज के युग में हमें पूर्ण तह नहीं मिल सकता है। लेकिन क्या जो बातें हमारे ग्रंथों में लिखी गई है वह झूठी है। या केवल पौराणिक कथाएं हैं।
      आज के युग में जब भी किसी व्यक्ति को किसी भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। तो सबसे पहले वह भगवान का ही नाम लेता है। और यह कहीं हद तक सही भी है। मान लो यह सारी बातें केवल पौराणिक कथा ही है लेकिन अगर किसी इंसान को इन ग्रंथों से कोई दिशा, या दुख दर्द दूर होता है तो इसमें बुराई ही क्या है। तो क्यों आज का समाज का भगवान के प्रति विश्वास उठता जा रहा है। और लोग अपनी संस्कृति, ग्रंथों को भूलते ही जा रहे हैं। जोकि बिल्कुल नहीं होना चाहिए क्योंकि जो बातें ग्रंथों में लिखी गई है वह हमारी संस्कृति को मानव समाज के मूल्यों को निर्देशित करती आ रही है। जिसे हमें कभी भूलना नहीं चाहिए।
     अब आखिर सत्य क्या है भगवान है या नहीं। या जो हमारे ग्रंथों में लिखा गया है वह केवल पौराणिक कथाएं हैं। चलो इस पर चर्चा करते हैं। उदाहरण के तौर पर हम भगवत गीता पर ही चर्चा करते हैं वैसे तो यह सारी बातें अन्य धर्म ग्रंथों पर भी लागू होती हैं।

भगवत गीता सच है या पौराणिक कथा?
भगवत गीता में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि भगवान कृष्ण यथा स्वरूप भगवान है। वही देवों के देव हैं। उनसे ही सारे जगत की उत्पत्ति हुई है। जो हो रहा है उनकी मर्जी से हो रहा है। जिसका विधि वत रूप में भगवत गीता में लिखा गया है। भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं गीता में कहा है जो कुछ भी होता है मेरी मर्जी से होता है चाहे वह भौतिक हो या सांसारिक सब कुछ मेरे ही द्वारा उत्पन्न और विलुप्त होता है। भौतिक हो या सांसारिक जीवित हो या निर्जीव हर किसी ने मैं ही हूं।

भगवत गीता के अनुसार।
भगवत गीता आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को यह दिव्य ज्ञान दिया गया था। जब अर्जुन ने युद्ध करने से मना कर दिया था तब भगवान ने स्वयं भगवत गीता का ज्ञान अर्जुन को दिया था।
    उससे पहले यह ज्ञान भगवान ने सूर्य देव (विवस्वान) को दिया था। (अध्याय 4 श्लोक 1 के अनुसार) त्रेता युग के आदि में विवस्वान ने परमेश्वर संबंधी इस विज्ञान का उपदेश मनु को दीया और मनुष्य के जनक मनु ने इसे अपने पुत्र इ‌क्षवाकु को दिया। इक्ष्वाकु इस पृथ्वी के शासक थे और उस रघुकुल के पूर्वज थे, जिसमें भगवान श्रीराम ने अवतार लिया।
       इस समय कलयुग के केवल 5000 वर्ष व्यतीत हुए हैं जबकि इसकी पुर्णायू 4,32,000 वर्ष है। इससे पूर्व द्वापर युग 8,00,000 वर्ष था और इससे पूर्व भी त्रेता युग 12,00,000 वर्ष था। इस प्रकार लगभग 20 लाख 5000 वर्ष पूर्व मनु ने अपने शिष्य तथा पुत्र इक्ष्वाकु से जो इस पृथ्वी का राजा थे, भगवत गीता कहीं। वर्तमान मनु की आयु लगभग 30,53,00,000 वर्ष अनुमानित की जाती है जिसमें से 12,04,00,000 वर्ष बीत चुके हैं। या मानते हुए की मनु के जन्म के पूर्व भगवान ने अपने शिष्य सूर्य देव विवस्वान को गीता सुनाई, मोटा अनुमान यह है कि गीता कम से कम 12,04,00,000 वर्ष पहले कही गई और मानव समाज में यह 20 लाख वर्षों से विद्यमान रही। लेकिन बीच में यह परंपरा टूट गई और फिर भगवान कृष्ण ने इसे लगभग 5000 वर्ष पूर्व अर्जुन से पुनः कहा।
      (अध्याय 1, श्लोक 7 क्या अनुसार) भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है। इस विराट भौतिक अभिव्यक्ति का सृजन, पालन तथा संहार पूर्णतया उनकी परम इच्छा पर निर्भर है। ब्रह्मा की मृत्यु होने पर। ब्रह्मा 100 वर्ष जीवित रहते हैं और उनका एक दिन हमारे 4,30,00,00,000 वर्षों के तुल्य है। रात्रि भी इतनी ही वर्षों की होती है। ब्रह्मा के 1 महीने में ऐसे 30 दिन तथा तीस राते होती है और उनकी 1 वर्ष में ऐसे 12 महीने होते हैं। ऐसे एक सौ वर्षो के बाद जब ब्रह्मा की मृत्यु होती है, तो प्रलय हो जाता है, जिसका अर्थ है की भगवान द्वारा प्रकट शक्ति पुनः सिमट कर उन्हीं में चली जाती है। पुनः जब विराट जगत को प्रकट करने की आवश्यकता होती है तो उनकी इच्छा से सृष्टि उत्पन्न होती है।
       भगवत गीता मनुष्य का कर्म, दुख सुख, आदि सभी का निदान भगवत गीता में भगवान द्वारा निर्देशित किया गया है। जैसा कि भगवान ने एक श्लोक में कहा था (कर्म करते जाओ, फल की चिंता मत करो।) भगवान के इस श्लोक का अर्थ मनुष्य ने सब कुछ अपने तरीके से ही समाविष्ट किया है। कोई कहता है मैं तो अच्छे ही कर्म करता हूं तो मेरे साथ बुरा क्यों होता है। इन सब बातों का उत्तर भगवत गीता में बताया गया है। मनुष्य जैसा कर्म करेगा वैसा ही फल पाएगा। निसंदेह भगवान श्री कृष्ण ने इसका भी उपाय बताया है उन्होंने कहा है अगर कोई कलयुग में मेरे नाम का केवल जब भी करें तो उसके जो बुरे कर्म है उनका फल कम हो जाएगा। जिस प्रकार बारिश होने पर हम छाता साथ में लेकर चलते हैं लेकिन हमारे पैर तब भीग जाते हैं। उसी प्रकार अगर तुम केवल मेरे नाम का जब करोगे तो तुम्हारे जो बुरे कर्म हैं वह जरूर कम हो जाएंगे। लेकिन कर्मों का फल तो भोगना पड़ेगा।

अगर वह भगवान थे तो उनको मनुष्य की तरह जीने की क्या आवश्यकता थी?
अब प्रश्न उठता है कि अगर श्री कृष्ण स्वयं भगवान है तो उन्हें मनुष्य की तरह जीवन क्यों जीना पड़ा क्यों उन्हें गुरुकुल में जाकर शिक्षा लेनी पड़ी। और क्यों उन्हें इतने दुख भोगने पड़े।
       भगवान श्री कृष्ण निसंदेह भगवान है। लेकिन उन्हें पता था कि भविष्य में मनुष्य को किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। और इसीलिए उन्होंने जब मनुष्य रूप में अवतार लिया तो उन्हें मनुष्य की ही तरह सारे नियमों का पालन करना पड़ा क्योंकि वह आने वाली पीढ़ी को यह बताना चाहते थे कि जिसने इस पृथ्वी पर जन्म लिया है उसे कर्म करने पड़ेंगे। और उसके कर्मों के अनुसार उसका जीवन यापन होगा। अगर खुद भगवान ही इनका पालन नहीं करते तो मनुष्य भले क्यों करता है। इसलिए भगवान ने मनुष्य योनि में आकर दुख सुख, कर्म आदि। सबका विधिपूर्वक पालन किया ताकि मनुष्य अपने समाज, अपनी संस्कृति को एक सही दिशा में ले जा सके।
       भगवत गीता भगवान श्री कृष्ण के मुख द्वारा निकले गए वचन है इसलिए इसको सब ग्रंथों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसमें मनुष्य के छोटी से छोटी, और बड़ी से बड़ी, परेशानियों सुख दुख का रहस्य है।
        इसमें एक सामान्य मनुष्य द्वारा कई प्रश्न मन में उठ सकते हैं। तो उन्हें इसके लिए भगवत गीता पढ़नी चाहिए। या केवल एक किताब ही नहीं बल्कि सारे ग्रंथों का समावेश है।

अगर माना यह एक पौराणिक कथा है।
चलो हम मान लेते हैं या एक पौराणिक कथा है। लेकिन जिस प्रकार से सबको विदित है की भगवत गीता 5000 वर्ष पूर्व कहीं गई थी या मान लो लिखी गई थी।
   तो जब यह भगवत गीता लिखी गई थी उस समय तो कोई पैसा या सोशल मीडिया नहीं था।  जिसने भी यह भगवत गीता लिखी ना तो उस समय उसको कोई पैसा मिला ना उसका उस समय कोई खास प्रचार हुआ। तो आखिर यह लिखी क्यों गई?
         और अगर यह एक पौराणिक कथा है तो इसमें इतने पात्रों का समावेश करना और अगर इसे हम एक कहानी माने तो इसका अंत इस तरीके से समाविष्ट करना किसी आम इंसान से तो नहीं लिखा जाएगा। तो सोचिए के यह इंसान कितना बुद्धिमान रहा होगा जिसने हर पहलू चाहे छोटा हो या बड़ा इंसान हो या पशु हर एक का किरदार एक दूसरे के साथ इस तरीके से तालमेल बिठा कर लिखना यह कोई आम इंसान नहीं लिख सकता।
      और अगर मान भी यह एक पौराणिक कहानी है तो उस इंसान ने कुछ भविष्य की कल्पना या समाज में आने वाले परिवर्तन को देखकर ही यह लिखा होगा जिससे पूरे मानव समाज का कल्याण हो सके।
    इस कहानी को अगर हम केवल कहानी माने तो इसमें महाभारत के ही पात्र इसमें शामिल नहीं है थे अपितु कहीं ना कहीं इस कहानी के जो पात्र थे वह किसी न किसी रूप में रामायण से भी संबंध रखते थे। उन्होंने अपने कर्मों के अनुसार दोबारा जन्म लेकर महाभारत और भगवत गीता के पात्रों के रूप में सम्मिलित हुए तो सोचिए, इतनी बड़ी कहानी कोई कैसे लिख सकता है जिसका संबंध त्रेता युग, द्वापर युग आदि से संबंधित है।
      अगर वह इंसान इतनी बड़ी कहानी लिख सकता है जिस समय ना कोई तकनीकी की थी और ना कोई सोशल मीडिया तो मैं यही कहूंगा अगर यह केवल एक कहानी भी है तो इसे सोच समझकर लिखा गया है भविष्य को देखकर समाज में आ रहे परिवर्तन को देखकर लिखा गया है। ताकि मनुष्य या समाज को आने वाली परेशानियों से बहुत गीता के माध्यम से उनको एक सही दिशा मिल सके और वह एक अच्छा जीवन यापन कर सके।

निष्कर्ष।
आजकल हमारे देश में भगवत गीता हो या अन्य, जिस धर्म के भी ग्रंथ हैं। उनमें पीढ़ी दर पीढ़ी कुछ बुद्ध जीवो द्वारा उनमें  हेरफेर देखने को मिलती है। किसी भगवान श्री कृष्ण को केवल एक महापुरुष के रूप में प्रदर्शित किया है तो किसी में अन्य रूपों में। कोई जब भगवत गीता का अनुवाद किसी दूसरी भाषा में करता है तो उसमें हेरफेर हो जाती है जिसके फलस्वरूप अर्थ का अनर्थ हो जाता है यही अन्य धर्म ग्रंथों में देखने को मिलता है।
     आज भगवत गीता पर दूसरे देश के लोग शोध कर रहे हैं और हमारे देश कुछ लोग इसे मानने को तैयार ही नहीं है। कहीं बाहर के देशों में भगवत गीता का नित्य पाठ होता है और यह तेजी से बढ़ता ही जा रहा है। तो जब दूसरे देश के लोग इसको पढ़ रहे हैं और समझ बूझ के साथ इसका पालन कर रहे हैं तो हमारे देश में ऐसा क्यों?
   अभी हाल ही में सुनने को आ रहा है गोरखपुर गीता प्रेस बंद होने के कगार पर है यह क्यों हो रहा है यह कभी सोचा है आपने? गीता प्रेस कोई लाभ के लिए भगवत गीता का प्रचार-प्रसार नहीं कर रही थी बल्कि वह समाज में हो रहे परिवर्तन को ध्यान में रखकर इसका प्रचार प्रसार कर रही थी। गीता प्रेस भगवत गीता को बहुत ही कम दामों में या फिर कई जगह समाज सेवा के रूप में वितरित करते आ रहे हैं। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हमारे समाज से अच्छी बातें हैं विलुप्त होने की कगार पर हैं।
    नई पीढ़ी को तो यह भी नहीं पता हमारी संस्कृति हमारा रहन-सहन किस तरीके का है बस हम एक दूसरे को देख कर ही जीते आ रहे हैं। जिसके कारण हमारे समाज में अनेक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं।
     अंत में मैं यही कहूंगा भगवत गीता भगवान के श्री मुख से निकली हुई वाणी है। जो मनुष्य हित के लिए भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया था।
       और अगर या एक पौराणिक कथा भी है तो इसमें हमें सोचने की आवश्यकता है इसमें जो बातें लिखी गई है वह मनुष्य हित के लिए ही है।

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1 टिप्पणियां

  1. मैं भागवत गीता में आस्था रखता हूं। और यह मानता हूं के हमारे बच्चों को स्कूल में यह घट्ठी कक्षा से के कर १२ तक पढ़ाई जानी चाहिए। जबताकी वे संसार के बीच जाएं तो वो सनसार में सही तरीके से जीने के ज्ञान से लैस हों।

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