भारतीय समाज में सोशल मीडिया और टीवी चैनल का प्रभाव।

 


कुछ दशकों से सोशल मीडिया और टीवी चैनल का प्रचार प्रसार इतना बढ़ चुका है, कि नई पीढ़ी बस उसी पर आधारित हो चुकी है।

केवल टीवी या दूरदर्शन मनोरंजन का साधन नहीं रह गया। अच्छी किताबें और अपनी संस्कृति के बारे में जानने में भी आनंद मिलता है। यह बात नई पीढ़ी को बताया गया होता तो आज वह सोशल मीडिया, टीवी आदि नेटवर्किंग साइट की आग में नहीं झुलस रहे होते। पहले केवल DD1 और मेट्रो चैनल हमारे घरों तक पहुंचते थे। और उसमें भी ज्यादातर अच्छे सीरियल दिखाए जाते थे। जैसे महाभारत, रामायण आदि। लेकिन अब सब कुछ बदलता जा रहा है, जब से सोशल मीडिया यह नए-नए टीवी चैनल उपलब्ध हुए हैं, तब से हमारी नई पीढ़ी की सोच बदलती जा रही है वह अपनी संस्कृति को, अपने समाज को, अपने रहन-सहन को भूलते जा रहे है।

सोशल मीडिया और टीवी चैनलों से नई पीढ़ी की विचारधारा  बदल रही है। जिससे उनके अंदर काफी नकारात्मक सोच उत्पन्न होती जा रही है।

समाज के नई पीढ़ी में इसका प्रभाव।

आज के दौर में जब भी हम टीवी ऑन करते हैं यह सोशल मीडिया तो उसमें कई तरीके के नृत्य, संगीत, सेक्स गतिविधियां दिखाई जाती हैं हर समय टीवी या सोशल मीडिया में कुछ ना कुछ गतिविधियां चलती रहती है कोई भी समय फ्री नहीं होता है। जिसमें कई प्रकार की गतिविधियां दिखाई जाती है जैसे कई सीरियल में सेक्स, हिंसा, ड्रग्स भड़कीले कार्यक्रम दिखाए जाते हैं। अब आप सोचिए जब 24 घंटे हम इन्हीं चीजों को देखते रहेंगे खासकर बच्चे तो यह बातें उनके दिमाग में बैठ जाती हैं उनको यही दुनिया सही लगती है। वह यह नहीं सोचते यह केवल एक कल्पना या सीरियल है।

ऐसे कार्यक्रम देखने से बच्चों का मानसिक स्तर सोचने समझने की शक्ति ऐसे ही कार्यों में लग जाती है जिस तरीके से वह टीवी के माध्यम से कलाकारों को देखते हैं वे उन्हीं का अनुसरण करते हैं उन्हीं के जैसे कपड़े पहनते हैं, सोने ,खाने का तरीका रहन-सहन का तरीका सब कुछ उन्हीं की तरह निभाते हैं। और अगर उनकी यह इच्छाएं पूरी नहीं होती है तो वह मानसिक दबाव में आ जाते हैं।

अगर आप देखें तो टीवी यह अन्य चैनल खोलने पर हमें देखने को मिलता है की दोपहर यह कार्यक्रम, रात को 2:00 बजे यह कार्यक्रम बस इसी तरीके से चलता रहता है जिससे बच्चों का मानसिक स्तर उसी के अनुसार ढल गया है। जोकि उनकी सेहत के लिए और परिवार के लिए और अपने भविष्य के लिए बिल्कुल सही नहीं है।

मानसिक तौर पर इसका प्रभाव।

नई पीढ़ी धीरे धीरे पश्चिमी संस्कृति को अपनाती जा रही है। वह उन्हीं की तरह कपड़े पहनना पसंद करते हैं, खाना खाना, पार्टी करना आदि उन्हीं की तरह सारी पद्धति अपनाते जा रहे हैं। और हमारी भारतीय संस्कृति विलुप्त होती जा रही है।

आजकल टीवी ऐसे कार्यक्रम प्रसारित करती है जो बच्चों और किशोरों को नहीं देखना चाहिए। इन कार्यक्रमों में अश्लीलता सेक्स और हिंसा को मिलाकर ऐसा कॉकटेल परोसा जाता है जो नशे का काम करता है।

14 से 22 वर्ष के किशोर इस नशे में चूर हुए जा रहे हैं। टीवी चैनल के लिए हमारी भारतीय संस्कृति हमारी परंपरा, शिक्षा कोई मायने नहीं रखता।

इसे उदाहरण के तौर पर समझते हैं। आपने देखा होगा कई टीवी सीरियल ऐसे हैं जो हमें सतर्क रखने के लिए कुछ क्राइम वाले सीरियल बनाते हैं ताकि हम उनसे सीख ले सके कि हमें अपनी सुरक्षा के लिए क्या-क्या इंतजाम करना चाहिए, यह बताने का अरे तुम करती है।

लेकिन होता क्या है नई पीढ़ी उन सीरियल से अच्छी बातें नहीं अपनाते हैं बल्कि यह सीखते हैं की किस तरीके से क्राइम को अंजाम दिया जा सकता है और वह उन्हीं तकनीकों का प्रयोग अपने जीवन में करते हैं।

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि जब हम बचपन से ही ऐसे सीरियल आदि देखते हैं तो हमें वह असल जिंदगी लगने लगती है, क्योंकि जब भी आप किसी चीज को बार-बार देखोगे तो आपको वही चीज अच्छी लगने लगेगी और हम उसी का प्रयोग अपने जीवन में करते हैं। क्योंकि बचपन में बच्चों को सही गलत का फर्क पता नहीं होता है उस समय उनको सही दिशा दिखाने की जरूरत है।

भारतीय समाज में नई पीढ़ी की सोच।

सोशल मीडिया टीवी चैनल के माध्यम से नई पीढ़ी की सोच बदल चुकी है। वह केवल अपने बारे में सोचती है। जिस में खुशी मिले वह काम करो चाहे गलत हो या सही। और जब भी समय मिलता है तो उस खाली समय को खेलकूद की जगह सोशल मीडिया या टीवी को दे दिया है।

नई पीढ़ी सोशल मीडिया और टीवी में इतने व्यस्त हो गए हैं की उनको किसी भी मुद्दे या समाज के बारे में, अपनी परंपरा, संस्कृति के बारे में सोचने की गुंजाइश ही नहीं है। वह बस पूरी तरीके से सोशल मीडिया और टीवी पर निर्भर हो चुके हैं।

इससे बचने के उपाय।

कानून बनाना।

संविधान की धारा 19 (1) क और 19 (2) मैं अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के साथ ही यह भी कहा गया है कि समाज व्यवस्था और नीति निर्धारण के लिए कानून बनाया जा सकता है। कानून बनाने से कुछ नियंत्रण हो सकता है।

अधिकतर भारतीय समाज में होता यह है कानून तो आसानी से बन जाता है लेकिन उसका सुचारू रूप से प्रयोग नहीं होता कहीं ना कहीं उसमें लचीलापन छोड़ दिया जाता है।

इसके लिए जरूरी है यह कड़ा कानून बनाया जाए और उस पर नजर भी रखी जाए उसकी कुछ सीमाएं तय की जाए जिससे समाज और नई पीढ़ी के बीच तालमेल बिठाया जा सके।

परिवार एक अहम हिस्सा।

हमें बच्चों को सही और गलत के बीच में अंतर समझाना होगा। मैं यह मानता हूं कि परिवर्तन ही जीवन का नियम है लेकिन उसके साथ साथ हमें अपने परंपरा संस्कृति को भी जीवित रखना है इसमें परिवार का अहम हिस्सा है। माता पिता को बच्चों के अंदर अच्छी भावनाएं कूट-कूट के भरनी पड़ेगी हो सके तो उनके गतिविधियों पर नजर रखें और साथ में ही उन्हें एक माता पिता, गुरु, दोस्त के रूप में समझाने की कोशिश करें।

जितना हो सके उन्हें अपने भारतीय संस्कृति समाज शिक्षा पर जोर देना होगा ताकि बच्चों के अंदर हमारी संस्कृति और मूल्यों की समझ पैदा हो सके। साथ में ही उन्हें अपने ग्रंथों धार्मिक रीति रिवाज के बारे में जानकारी दें जिससे उनको सही और गलत का अंतर महसूस हो सके

यकीन मानिए अगर बच्चे आधा दिन टीवी देखते हैं तो बाकी बचा दिन वह आपके साथ हैं उस समय आप उन्हें अच्छे संस्कार दे तो निश्चित रूप से उनके अंदर एक अच्छी भावना पैदा होगी तब वह कोई गलत चीज भी या बातें भी सुन ले तो वह उनकी ओर आकर्षित नहीं होंगे। और उसके साथ वार्तालाप करो कि उसने टीवी में क्या क्या देखा और क्या सीखा और साथ साथ में ही अपने अनुभव के आधार पर और अपने पारिवारिक या सामाजिक गतिविधियों के आधार पर उन्हें प्रोत्साहित करें।

निष्कर्ष।

हमें समाज और संस्कृति के बदलते अनुरूप ढलना जरूरी है। पर इसका यह मतलब नहीं कि हम अपने रीति-रिवाजों, परंपराओं अपने धार्मिक ग्रंथों को भूल जाएं।

      सोशल मीडिया और टीवी भारत के सांस्कृतिक और पारंपरिक गौरव और पहचान को लगातार बर्बाद कर रहा है। कई विदेशी चैनल को देखकर लगता है कि वह विशेष सूचना के जरिए भारत वासियों को मनोरंजन बाजार के उपभोक्ता बनाने में सफल हो गए हैं। इन चैनलों के जरिए हिंसा और सेक्स के अनावश्यक प्रदर्शन ने देश की संस्कृति और राष्ट्रीय विरासत को खतरे में डाल दिया है। मनन, विचार विमर्श और संवाद की परंपरा क्षीण हो चली है।

    टीवी पर ज्यादातर कार्यक्रम ऐसे प्रसारित होते हैं जिससे देश की एकता, संस्कृत का विरोध कर रही विदेशी ताकतों को बल मिलता है। जब तक दूरदर्शन पर सरकारी नियंत्रण था तो ऐसी चीजें उतनी नहीं दिखाई जाती थी।

मनोरंजन मनुष्य के विकास के लिए अहम हिस्सा है। मनुष्य को अगर अच्छा और खुशहाल जीवन चाहिए तो मनोरंजन होना जरूरी है लेकिन अब मनोरंजन का मतलब ही बदल चुका है बार-बार टीवी , सोशल मीडिया पर क्राइम, अश्लील आदि को प्रसारित करके नई पीढ़ी का नजरिया ही बदल चुका है। टीवी सोशल मीडिया ने बच्चों के बनावट ऐसी बना दी है की उनके अंदर से प्रेम भावना, सामाजिक रहन-सहन ही गायब हो चुका है। छोटे बच्चे किसी भी चीज की जल्दी से नकल कर लेते हैं वह टीवी में जो देख रहे हैं उसका अनुसरण कर रहे हैं। और उसमें जो ज्यादातर गलत बातें हैं वही टीवी में दिखाई जा रही है।

    ऐसी गतिविधियों से बच्चे अपने भविष्य अपना कैरियर बना सकते हैं लेकिन उनके साथ खुश नहीं रह सकते। अगर नई पीढ़ी को ऐसी गतिविधियों से बचाना है तो इसमें सरकार और समाज, परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा है जो एक साथ मिलकर ऐसी बाधाओं से निपट सकते हैं।

अच्छे मनुष्य के बगैर न स्वास्थ्य समाज बनता है ना स्वास्थ्य देश, या हमें भूलना नहीं चाहिए।


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